मैं हूँ अपनी कमजोरी
अपने कदम गिनते -गिनते
थक जाता हूँ
फ़िर ख़ुद को वहीं
दोराहे ,तिराहे , चौराहे पे
खड़ा पाता हूँ ..
अपने तश्तरियों पे
अपने रसोई की खूब जमाता हूँ
आने -जाने वालों को
भरपेट खिलाता भी हूँ
वही दोराहे , तिराहे ,चौराहे
वाले जब पेट भर दुआएं देते हैं
ख़ुद को भरा पाता हूँ
घंटे -दो -घंटे बाद फ़िर ख़ुद को
ना जाने क्यूँ भूखा पाता हूँ
एक दिन पकवानों से खेलने वाला
मेरी चाशनी पे चढ़ गया
मेरी तश्तरियों पर खींची हुई
हद से बढ़ गया
भाई .. हाथ में भर -भर खिलाता हूँ
और तुमसे कोई सवाल भी तो नहीं पूछता
अच्छा लगे तो कहो वरना
छोड़ के चले जाओ वरना ...
कौन माँगता है तुमसे नई तरकीबें
चाशनी मीठी करने के
मैं जानता हूँ
हुनर तुम्हारा भी तुम्हारा
अपना कहाँ है
कितने रसोइयों की जासूसी की है तुमने
कितनों को चखा है बेईज्ज़त होकर
सिखाते क्यूँ हो मुझे फ़िर
उसे जो की समझ निखार लेता है
घंटे -दो -घंटे भर कर
छोटी -छोटी डकारों में छुपे तारीफों के लफ्ज़
चलो .. बदल लेता हूँ फ़िर से
अपने कदमों का बहाव
तुमसे अलग
अगले चौराहे ,तिराहे ,दुराहे की तरफ़ ...!!!
Thursday, February 19, 2009
Wednesday, February 18, 2009
तुम्हे पढता हूँ तो
एक गरीब के घर की खाता हूँ
मैं भी गरीब कहलाता हूँ ...
रोकता हूँ.. अफवाहों को..
पर तंगी से डर जाता हूँ..
मैं कोने में खड़ा-खड़ा
मिटटी लपेट कर पढता हूँ
हर रात तुम्हे...
केरोसिन के बोतल में
अपनी सारी महक डूबा देते हो ..
तुम्हे पढता हूँ
तो लिखने से घबराता हूँ .....
मैं भी गरीब कहलाता हूँ ...
रोकता हूँ.. अफवाहों को..
पर तंगी से डर जाता हूँ..
मैं कोने में खड़ा-खड़ा
मिटटी लपेट कर पढता हूँ
हर रात तुम्हे...
केरोसिन के बोतल में
अपनी सारी महक डूबा देते हो ..
तुम्हे पढता हूँ
तो लिखने से घबराता हूँ .....
Wednesday, January 28, 2009
ये तेरी आँखें न होती
ये तेरी आँखें न होती
बस किनारे बाजुओं के
देखता मैं और तुमको
सोच लेता ,भांप जाता
जो समझता वो मैं अपने
पास रखता भूल जाता
पूछती बस तुम भी कुछ ना
ना मैं तुमको कुछ बताता
मैं नहीं कहता कभी कुछ
बस किनारे बाजुओं के
देखता मैं और तुमको
सोच लेता ,भांप जाता
जो समझता वो मैं अपने
पास रखता भूल जाता
पूछती बस तुम भी कुछ ना
ना मैं तुमको कुछ बताता
मैं नहीं कहता कभी कुछ
वक्त को कुछ ढूँढना था
बस तुम्हारी आंखों से वो
ढूंढ लेता ... चुप हो जाता
बस तुम्हारी आंखों से वो
Monday, January 26, 2009
तुमने पढ़ा मुझे आज!!!
थके हारे हजारों सालों से थे।
सबके फेफ़रों में भरते थे
अपनी बेशकीमती दुनिया ।
हवाओं ने जान लगाकर....
सबमें भर रखा जान को
ज़िन्दगी के आखिरी कदम तक...!!
क्या सबके लिए सोचते रहे??
हाँ..,जब ऊपर से आर्डर मिलता था
और तूफ़ान बन कर आते थे
तब भी आखिरी दम तक
हर बच्चे की साँस में ख़ुद को भरा रखते थे
महसूस करते थे वो भी
डूबते आदमी की तकलीफ।
उसे भी ज़रूरत थी साँस की
फेफरे तरस रहे थे उसके
हवा के लिए..!!
मगर हवाओं के लिए किसी के दिल में
प्यार थोड़े ही ना था
बस एक ज़रूरत थी हवा..!!
फ़िर एक दिन अचानक
आँख खुली!
और हवाओं ने ज़ोर से साँस भरी
अपना रूप कभी उन्होंने निहारा ही नहीं था!!
लगा ऐसे के जैसे लफ्जों ने
पढ़ लिया हो शायर को..!
पिघला लोहा,
लोहार की शक्ल का हो गया..!!
सूखी फसलों ने..
ख़ुद को आग-वाग लगा के
मिटटी को दुलारा
खाद से सवारां
रंगों ने तालियाँ बजाई
कैनवस के लिए....
तुमने पढ़ा मुझे आज!!!
सबके फेफ़रों में भरते थे
अपनी बेशकीमती दुनिया ।
हवाओं ने जान लगाकर....
सबमें भर रखा जान को
ज़िन्दगी के आखिरी कदम तक...!!
क्या सबके लिए सोचते रहे??
हाँ..,जब ऊपर से आर्डर मिलता था
और तूफ़ान बन कर आते थे
तब भी आखिरी दम तक
हर बच्चे की साँस में ख़ुद को भरा रखते थे
महसूस करते थे वो भी
डूबते आदमी की तकलीफ।
उसे भी ज़रूरत थी साँस की
फेफरे तरस रहे थे उसके
हवा के लिए..!!
मगर हवाओं के लिए किसी के दिल में
प्यार थोड़े ही ना था
बस एक ज़रूरत थी हवा..!!
फ़िर एक दिन अचानक
आँख खुली!
और हवाओं ने ज़ोर से साँस भरी
अपना रूप कभी उन्होंने निहारा ही नहीं था!!
लगा ऐसे के जैसे लफ्जों ने
पढ़ लिया हो शायर को..!
पिघला लोहा,
लोहार की शक्ल का हो गया..!!
सूखी फसलों ने..
ख़ुद को आग-वाग लगा के
मिटटी को दुलारा
खाद से सवारां
रंगों ने तालियाँ बजाई
कैनवस के लिए....
तुमने पढ़ा मुझे आज!!!
Tuesday, January 20, 2009
धूप-रौशनी-ज़िन्दगी
सुबह का वक़्त
उठा-पटक बहुत सारी
कौन किसपे कितना भारी??
रास्ते पे रौशनी के गट्ठे रखे हैं
उसपर काले-कलूटों की मारा-मारी!
और वो जो सबसे ऊपर हैं ना
दूर से फोटोग्राफी में मशगूल
अपने ही कैमरे में पकड़ लेता है..
मिटटी-शिट्टी,फूल-वूल !
और एक तुम भी हो
जो कम्बल से मुंह निकालकर.. सर्दियों में
गर्म रौशनी ढूंढती हो,
थोडी गर्माहट सूंघती हो !!
फिर दिन-भर अपने घर पर..
आला-दर्ज़े की धूप बन जाती हो !
और तुम्हारे रात भर सपनों से भरी-भरी पोटली भी
उठकर खिड़की के पास साँस लेती हैं !!
वक़्त बारीकी से तब खुरचता है,
तुम्हारे हाथों पे दिन भर की लकीरें...,
पिछली सारी खुशियों और तकलीफ़ों को सपाट करके..!!
ना जाने फ़िर से, कौन सी, कितनी लकीरें बांटता होगा
पर इनकी वजह से, धूप-रौशनी-ज़िन्दगी
इन सबके होने का मतलब
कोई पागल भी समझ जाता होगा...!!!!
उठा-पटक बहुत सारी
कौन किसपे कितना भारी??
रास्ते पे रौशनी के गट्ठे रखे हैं
उसपर काले-कलूटों की मारा-मारी!
और वो जो सबसे ऊपर हैं ना
दूर से फोटोग्राफी में मशगूल
अपने ही कैमरे में पकड़ लेता है..
मिटटी-शिट्टी,फूल-वूल !
और एक तुम भी हो
जो कम्बल से मुंह निकालकर.. सर्दियों में
गर्म रौशनी ढूंढती हो,
थोडी गर्माहट सूंघती हो !!
फिर दिन-भर अपने घर पर..
आला-दर्ज़े की धूप बन जाती हो !
और तुम्हारे रात भर सपनों से भरी-भरी पोटली भी
उठकर खिड़की के पास साँस लेती हैं !!
वक़्त बारीकी से तब खुरचता है,
तुम्हारे हाथों पे दिन भर की लकीरें...,
पिछली सारी खुशियों और तकलीफ़ों को सपाट करके..!!
ना जाने फ़िर से, कौन सी, कितनी लकीरें बांटता होगा
पर इनकी वजह से, धूप-रौशनी-ज़िन्दगी
इन सबके होने का मतलब
कोई पागल भी समझ जाता होगा...!!!!
Wednesday, January 7, 2009
बहरा
देर तक बातें तुम्हारी
इतनी बार सुनी है.
के अब जब याद आती हो..
बहरा हो जाता हूँ....
गूंजने लगते हैं
सारे मीठे-प्यारे अल्फाज़
सौ दिनों में ज़िन्दगी तुम्हारी
मेरे दिनों को हज़ार कर गयी..
तुम बोलती गयी इतना
के मेरे अंतर को
खूबसूरती से बहरा कर गयी!!
इतनी बार सुनी है.
के अब जब याद आती हो..
बहरा हो जाता हूँ....
गूंजने लगते हैं
सारे मीठे-प्यारे अल्फाज़
सौ दिनों में ज़िन्दगी तुम्हारी
मेरे दिनों को हज़ार कर गयी..
तुम बोलती गयी इतना
के मेरे अंतर को
खूबसूरती से बहरा कर गयी!!
Friday, November 28, 2008
और फ़िर तुम सो रही होती.
रात बहुत नहा चुकी है
अंधेरे में
अब आसमान भी बहुत साफ़ है
मेरे छत के घेरे में
बीच इनके कोशिश करता हूँ
के थोड़ा सूनापन
महसूस करुँ
तुमसे, तुम्हारे खयालों से
और तुम्हारे हादसे से
थोड़ा तो डरूं
पर वही किस्सा
तुम इतने पास लगती हो
लगता है
अभी बोल उठोगी
"अरे.. सपने में
कुछ भी बड़-बड़ाते रहते हो.."
देखो सुना फ़िर तुम्हे मैंने..
"अरे जब बोल रही हूँ..
तो सुनोगे ही..
चलो अब आँखें खोलो..
और प्लीज़ कुछ सेंसिबल बोलो"
इतना करीब कैसे कोई
क्या सच है क्या सपना
ख़बर ही नहीं लगती है..
"इतना उल्लू कैसे कोई
कब जागे कब सोये
ख़बर ही नहीं लगती है"
अच्छा... रात को देर तक जागता हूँ
तो मुझे उल्लू बना दिया..
"नहीं... थोड़ा टेढा समझे..
उल्लू हो इसीलिए... देर तक जागते हो.."
और तुम... तुम क्या हो..
"ये तो
तुम भी नहीं जानते हो..
पर कोई इतना प्यारा
जिसके सपने को भी सच मानते हो.."
खुशफ़हमी में हो..
"हाँ.. तुम्हारी खुश-फ़हमी हूँ..
पर तुम्हारी हूँ..."
यानी झूठ हो...
"शायद.. पर तुम्हारे लाखों
बेकार सच्चाइयों
से लाख़-गुनी सच्ची....
है के नहीं??"
हो के नहीं...
ये भी तो जानना ज़रूरी है..
"तुम में और मुझमें तो
सिर्फ़ ख़याल भर की दूरी है..!!"
फ़िर सुनाई क्यूँ देती हो
इतनी साफ़
जैसे तुम मेरे ही अंदर हो
मेरा ही एक कोई
काम्पलेक्स आद्ध्यात्मिक पुर्ज़ा
दूरी कितनी
ख्याल भर की या नहीं
नहीं जानता..
पर तुमसे अलग होने की बात मैं
नहीं मानता...
"अब आगे मेरे लिए कुछ भी बोलना
ठीक नहीं होगा.."
क्यूँ??
"प्यार पर से परदा उठने लगेगा..
कुछ दोस्त तुम्हारे
और मेरी सहेलियाँ
डर जायेंगे..
फ़िर थोड़े-थोड़े डर से
शायद हम दोनों भर जायेंगे.."
अब भी डरती हो..
"प्रेम करती हूँ.."
जवाब नहीं दोगी...
" सब कुछ तो तुम्हारा है..
उन्ही में छांटकर
कोई प्यारा सा जवाब चुन लो.."
छोड़ो
सब उलझाकर
टुकडों में बाँटकर
इस धुंधलेपन में बस मेरी धुन लो
"चलो.. फ़िर दोहराते हैं.."
क्या?
"यही के वक्त फ़िरता
मैं भी फ़िरी होती..
थोडी सी गिरी होती"
वक्त फिरता..
मैं भी फ़िरा होता..
थोड़ी देर मरा होता..
"लौट आती सब सवालों के
जवाब लिए"
अपने हाथों में
तुम्हारे लिए ख्वाब लिए..!!!
"और फ़िर तुम सो रहे होते..
सुबह इतनी..
बिना ये सोचे..
के मैं गाज़ हूँ की
सिर्फ़ एक हार्मलेस आवाज़ हूँ"
और फ़िर तुम सो रही होती..
अपने ख़्वाबों की चादर में..
अपने सोच के अस्तबल से
बढ़िया कीमती घोड़े बेचकर..!!
अंधेरे में
अब आसमान भी बहुत साफ़ है
मेरे छत के घेरे में
बीच इनके कोशिश करता हूँ
के थोड़ा सूनापन
महसूस करुँ
तुमसे, तुम्हारे खयालों से
और तुम्हारे हादसे से
थोड़ा तो डरूं
पर वही किस्सा
तुम इतने पास लगती हो
लगता है
अभी बोल उठोगी
"अरे.. सपने में
कुछ भी बड़-बड़ाते रहते हो.."
देखो सुना फ़िर तुम्हे मैंने..
"अरे जब बोल रही हूँ..
तो सुनोगे ही..
चलो अब आँखें खोलो..
और प्लीज़ कुछ सेंसिबल बोलो"
इतना करीब कैसे कोई
क्या सच है क्या सपना
ख़बर ही नहीं लगती है..
"इतना उल्लू कैसे कोई
कब जागे कब सोये
ख़बर ही नहीं लगती है"
अच्छा... रात को देर तक जागता हूँ
तो मुझे उल्लू बना दिया..
"नहीं... थोड़ा टेढा समझे..
उल्लू हो इसीलिए... देर तक जागते हो.."
और तुम... तुम क्या हो..
"ये तो
तुम भी नहीं जानते हो..
पर कोई इतना प्यारा
जिसके सपने को भी सच मानते हो.."
खुशफ़हमी में हो..
"हाँ.. तुम्हारी खुश-फ़हमी हूँ..
पर तुम्हारी हूँ..."
यानी झूठ हो...
"शायद.. पर तुम्हारे लाखों
बेकार सच्चाइयों
से लाख़-गुनी सच्ची....
है के नहीं??"
हो के नहीं...
ये भी तो जानना ज़रूरी है..
"तुम में और मुझमें तो
सिर्फ़ ख़याल भर की दूरी है..!!"
फ़िर सुनाई क्यूँ देती हो
इतनी साफ़
जैसे तुम मेरे ही अंदर हो
मेरा ही एक कोई
काम्पलेक्स आद्ध्यात्मिक पुर्ज़ा
दूरी कितनी
ख्याल भर की या नहीं
नहीं जानता..
पर तुमसे अलग होने की बात मैं
नहीं मानता...
"अब आगे मेरे लिए कुछ भी बोलना
ठीक नहीं होगा.."
क्यूँ??
"प्यार पर से परदा उठने लगेगा..
कुछ दोस्त तुम्हारे
और मेरी सहेलियाँ
डर जायेंगे..
फ़िर थोड़े-थोड़े डर से
शायद हम दोनों भर जायेंगे.."
अब भी डरती हो..
"प्रेम करती हूँ.."
जवाब नहीं दोगी...
" सब कुछ तो तुम्हारा है..
उन्ही में छांटकर
कोई प्यारा सा जवाब चुन लो.."
छोड़ो
सब उलझाकर
टुकडों में बाँटकर
इस धुंधलेपन में बस मेरी धुन लो
"चलो.. फ़िर दोहराते हैं.."
क्या?
"यही के वक्त फ़िरता
मैं भी फ़िरी होती..
थोडी सी गिरी होती"
वक्त फिरता..
मैं भी फ़िरा होता..
थोड़ी देर मरा होता..
"लौट आती सब सवालों के
जवाब लिए"
अपने हाथों में
तुम्हारे लिए ख्वाब लिए..!!!
"और फ़िर तुम सो रहे होते..
सुबह इतनी..
बिना ये सोचे..
के मैं गाज़ हूँ की
सिर्फ़ एक हार्मलेस आवाज़ हूँ"
और फ़िर तुम सो रही होती..
अपने ख़्वाबों की चादर में..
अपने सोच के अस्तबल से
बढ़िया कीमती घोड़े बेचकर..!!
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