कब तक
करता रहूँ यार...|
तुमसे
ये भारी भरकम प्यार|
साल बारह ,
दिन इक्यासी!
आस मेरी,
अब भी प्यासी!
कहाँ है,
(अब कीबोर्ड पर
पटखनी देकर),
लिखने में मज़ा वो?
जो आता था..
तुम्हे बादलों पर
चढाकर....
अपनी हथेली दबाने में..!!!
तुम चाल चलती,
बातों में लपेटकर,
कुछ मील हज़ार..!
और मैं समझता था..
तुम पास आ रही हो..!!
इत्रों की फैक्टरियों में..,
अपनी साँसों की ब्रैंडिंग की.. !
तुम उठते ही
बिना कुछ किए .....:)
अपने होंठ सुंघा देती थी..
और मैं बेईमान
मैं उसे प्यार समझता था..!!
अब भी माल,
कुछ
बढ़िया लगता है
पर तुम्हारा
"इमोशनली ड्रेनिंग चेहरा"
-साला...!!
खींच लेता है
हाथ अपने,
मेरे कोम्फोर्ट ज़ोन से,
छोड़ नहीं सकता तुम्हें..!!!
साल बारह दिन बिरासी
कल भी सब
यही रीपीट होगा
इस प्यार के लिए कोई
डाईटिंग ऑप्शन नहीं है!!!
Saturday, August 15, 2009
Tuesday, April 21, 2009
जब भी वो पहाडों से गोता लगाता है
उतार नहीं पाता
छत से
बादलों को ..
ना ही ख़ुद
बादल
बन पाता है ..!!
शायद इसीलिए
पहाडों से गोता लगाता है ..!!!
पत्थरों को खुरचकर
जज़्बात
नहीं निखार पाता
और उसे
पत्थर तराशना
नहीं आता है ..!!
फ़िर क्यूँ ..
हवा में ही रेत हो जाता है ?
जब भी वो
पहाडों से गोता लगाता है...
हवा में ही रेत हो जाता है ..!!!
छत से
बादलों को ..
ना ही ख़ुद
बादल
बन पाता है ..!!
शायद इसीलिए
पहाडों से गोता लगाता है ..!!!
पत्थरों को खुरचकर
जज़्बात
नहीं निखार पाता
और उसे
पत्थर तराशना
नहीं आता है ..!!
फ़िर क्यूँ ..
हवा में ही रेत हो जाता है ?
जब भी वो
पहाडों से गोता लगाता है...
हवा में ही रेत हो जाता है ..!!!
Monday, February 23, 2009
थारी सुन ली ..थारी सुन ली
थारी सुन ली ..थारी सुन ली
पर उसकी ही बस सारी धुन ली
मिटटी -पत्थर , सोना -खद्दर
अपनी चद्दर आप ही चुन ली
हँसी ठिठोली , बारिश गाने
बरसातों में रोज़ नहाने
कई सुनहरी सुबह छोड़ी
बादल की बेकारी बुन ली
थारी सुन ली , थारी सुन ली
चमक -चमक के धमकाया भी
अंधेरों को भरमाया भी
भर -भर मन में आधी मूरत
एक पायल की मोटी सिल्ली
खूब खोल के भूखा रह -रह
नमक पसीने की मीठी तह
तीन टमाटर एक मिर्च के
साथ जलाई पेट की झिल्ली
रोक बाहरी , रोक सौ खड़ी
सोच के डब्बे की किरकिरी
उसको खाया उसको पिया
सन्यासी की छवि भी धर ली
थारी सुन ली , थारी सुन ली ....!
पर उसकी ही बस सारी धुन ली
मिटटी -पत्थर , सोना -खद्दर
अपनी चद्दर आप ही चुन ली
हँसी ठिठोली , बारिश गाने
बरसातों में रोज़ नहाने
कई सुनहरी सुबह छोड़ी
बादल की बेकारी बुन ली
थारी सुन ली , थारी सुन ली
चमक -चमक के धमकाया भी
अंधेरों को भरमाया भी
भर -भर मन में आधी मूरत
एक पायल की मोटी सिल्ली
खूब खोल के भूखा रह -रह
नमक पसीने की मीठी तह
तीन टमाटर एक मिर्च के
साथ जलाई पेट की झिल्ली
रोक बाहरी , रोक सौ खड़ी
सोच के डब्बे की किरकिरी
उसको खाया उसको पिया
सन्यासी की छवि भी धर ली
थारी सुन ली , थारी सुन ली ....!
Saturday, February 21, 2009
बाँट लेंगे चाँद दोनों
"कितनी आसानी से लिखते हो !!"
बाँट लेंगे चाँद दोनों
दौड़ती,
तुम सुबह से शाम हो जाती हो!
एक लम्बी-चौड़ी मुस्कराहट से
एक धीमी मुस्कान हो जाती हो...!
भागती यहाँ से वहां
"ऐसे जैसे किसी खेत में आग लगी हो"
और फ़िर गाँव की तुम
"सोचने दो.....ठकुराइन हो जाती हो |"
तुम्हारे लिए इतना झूठ लिखता हूँ
और तुम्हारा कहना
"तुम बस तारीफों पे बिकते हो |"
बाँट लेंगे चाँद दोनों |
कभी-कभी मज़ाक तुम्हे समझ नहीं आते हैं,
ज्यादातर बाद में तुम्हे तुम्हारे दोस्त ही समझाते हैं |
देर लौटती हो ,दूर तकती हो
"खिड़की के बाहर मुझे सारे नज़र आते हैं |"
मेरी बातों पर हँसती नहीं हो ,
नाराज़ हो जाती हो |
फ़िर गुस्से में आप सुस्त पड़ जाती हो
नींद में दबी-दबी
नींद में घुल जाती हो |
और तो और सपनों में पूछती जाती हो
"हर वक्त इतना खुश क्यूँ दिखते हो ?"
बाँट लेंगे चाँद दोनों |
बाँट लेंगे चाँद दोनों
दौड़ती,
तुम सुबह से शाम हो जाती हो!
एक लम्बी-चौड़ी मुस्कराहट से
एक धीमी मुस्कान हो जाती हो...!
भागती यहाँ से वहां
"ऐसे जैसे किसी खेत में आग लगी हो"
और फ़िर गाँव की तुम
"सोचने दो.....ठकुराइन हो जाती हो |"
तुम्हारे लिए इतना झूठ लिखता हूँ
और तुम्हारा कहना
"तुम बस तारीफों पे बिकते हो |"
बाँट लेंगे चाँद दोनों |
कभी-कभी मज़ाक तुम्हे समझ नहीं आते हैं,
ज्यादातर बाद में तुम्हे तुम्हारे दोस्त ही समझाते हैं |
देर लौटती हो ,दूर तकती हो
"खिड़की के बाहर मुझे सारे नज़र आते हैं |"
मेरी बातों पर हँसती नहीं हो ,
नाराज़ हो जाती हो |
फ़िर गुस्से में आप सुस्त पड़ जाती हो
नींद में दबी-दबी
नींद में घुल जाती हो |
और तो और सपनों में पूछती जाती हो
"हर वक्त इतना खुश क्यूँ दिखते हो ?"
बाँट लेंगे चाँद दोनों |
Thursday, February 19, 2009
अगले चौराहे ,तिराहे ,दुराहे की तरफ़
मैं हूँ अपनी कमजोरी
अपने कदम गिनते -गिनते
थक जाता हूँ
फ़िर ख़ुद को वहीं
दोराहे ,तिराहे , चौराहे पे
खड़ा पाता हूँ ..
अपने तश्तरियों पे
अपने रसोई की खूब जमाता हूँ
आने -जाने वालों को
भरपेट खिलाता भी हूँ
वही दोराहे , तिराहे ,चौराहे
वाले जब पेट भर दुआएं देते हैं
ख़ुद को भरा पाता हूँ
घंटे -दो -घंटे बाद फ़िर ख़ुद को
ना जाने क्यूँ भूखा पाता हूँ
एक दिन पकवानों से खेलने वाला
मेरी चाशनी पे चढ़ गया
मेरी तश्तरियों पर खींची हुई
हद से बढ़ गया
भाई .. हाथ में भर -भर खिलाता हूँ
और तुमसे कोई सवाल भी तो नहीं पूछता
अच्छा लगे तो कहो वरना
छोड़ के चले जाओ वरना ...
कौन माँगता है तुमसे नई तरकीबें
चाशनी मीठी करने के
मैं जानता हूँ
हुनर तुम्हारा भी तुम्हारा
अपना कहाँ है
कितने रसोइयों की जासूसी की है तुमने
कितनों को चखा है बेईज्ज़त होकर
सिखाते क्यूँ हो मुझे फ़िर
उसे जो की समझ निखार लेता है
घंटे -दो -घंटे भर कर
छोटी -छोटी डकारों में छुपे तारीफों के लफ्ज़
चलो .. बदल लेता हूँ फ़िर से
अपने कदमों का बहाव
तुमसे अलग
अगले चौराहे ,तिराहे ,दुराहे की तरफ़ ...!!!
अपने कदम गिनते -गिनते
थक जाता हूँ
फ़िर ख़ुद को वहीं
दोराहे ,तिराहे , चौराहे पे
खड़ा पाता हूँ ..
अपने तश्तरियों पे
अपने रसोई की खूब जमाता हूँ
आने -जाने वालों को
भरपेट खिलाता भी हूँ
वही दोराहे , तिराहे ,चौराहे
वाले जब पेट भर दुआएं देते हैं
ख़ुद को भरा पाता हूँ
घंटे -दो -घंटे बाद फ़िर ख़ुद को
ना जाने क्यूँ भूखा पाता हूँ
एक दिन पकवानों से खेलने वाला
मेरी चाशनी पे चढ़ गया
मेरी तश्तरियों पर खींची हुई
हद से बढ़ गया
भाई .. हाथ में भर -भर खिलाता हूँ
और तुमसे कोई सवाल भी तो नहीं पूछता
अच्छा लगे तो कहो वरना
छोड़ के चले जाओ वरना ...
कौन माँगता है तुमसे नई तरकीबें
चाशनी मीठी करने के
मैं जानता हूँ
हुनर तुम्हारा भी तुम्हारा
अपना कहाँ है
कितने रसोइयों की जासूसी की है तुमने
कितनों को चखा है बेईज्ज़त होकर
सिखाते क्यूँ हो मुझे फ़िर
उसे जो की समझ निखार लेता है
घंटे -दो -घंटे भर कर
छोटी -छोटी डकारों में छुपे तारीफों के लफ्ज़
चलो .. बदल लेता हूँ फ़िर से
अपने कदमों का बहाव
तुमसे अलग
अगले चौराहे ,तिराहे ,दुराहे की तरफ़ ...!!!
Wednesday, February 18, 2009
तुम्हे पढता हूँ तो
एक गरीब के घर की खाता हूँ
मैं भी गरीब कहलाता हूँ ...
रोकता हूँ.. अफवाहों को..
पर तंगी से डर जाता हूँ..
मैं कोने में खड़ा-खड़ा
मिटटी लपेट कर पढता हूँ
हर रात तुम्हे...
केरोसिन के बोतल में
अपनी सारी महक डूबा देते हो ..
तुम्हे पढता हूँ
तो लिखने से घबराता हूँ .....
मैं भी गरीब कहलाता हूँ ...
रोकता हूँ.. अफवाहों को..
पर तंगी से डर जाता हूँ..
मैं कोने में खड़ा-खड़ा
मिटटी लपेट कर पढता हूँ
हर रात तुम्हे...
केरोसिन के बोतल में
अपनी सारी महक डूबा देते हो ..
तुम्हे पढता हूँ
तो लिखने से घबराता हूँ .....
Wednesday, January 28, 2009
ये तेरी आँखें न होती
ये तेरी आँखें न होती
बस किनारे बाजुओं के
देखता मैं और तुमको
सोच लेता ,भांप जाता
जो समझता वो मैं अपने
पास रखता भूल जाता
पूछती बस तुम भी कुछ ना
ना मैं तुमको कुछ बताता
मैं नहीं कहता कभी कुछ
बस किनारे बाजुओं के
देखता मैं और तुमको
सोच लेता ,भांप जाता
जो समझता वो मैं अपने
पास रखता भूल जाता
पूछती बस तुम भी कुछ ना
ना मैं तुमको कुछ बताता
मैं नहीं कहता कभी कुछ
वक्त को कुछ ढूँढना था
बस तुम्हारी आंखों से वो
ढूंढ लेता ... चुप हो जाता
बस तुम्हारी आंखों से वो
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