Saturday, December 12, 2015

Third Act

Act I

साल दो,
बाल दो,
हिले नहीं।

 job, no?

रौब, no?
दोनों ही
मिले नहीं !

दोस्त हैं
कोसते हैं
दम  नहीं
rum नहीं

क्या कहें
हमने कभी
कोशिशें ही
की नहीं
  

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Act II

उछले इरादों को
पिछले दरवाज़ों से
entry दिलाई थी
पाला नवाज़ों से

drum को करम माना
beat का current जाना
जंघा पे थप थप की
क्लासिक रिवाज़ों से

नींद को भी रोक लिया
फ़लसफ़े का झोंक लिया
दिल को खरोंच लिया
नश्तालिक़ सांचों से

prose में सवाल आये
धुन में जवाब सने
दिन के गुलाम सही
चाँद के नवाब बने

गाल पे हंसी उभरी
ताल के इशारों पे
हीरे नि मोती लुटे
कब्रों के ढाँचे से





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 Act  III

शाम की ऐसी ही है रफ़्तार

(च्च , च्च )

दो सड़कों के बीच है बच्चा
धुंआ खाता पीता है
लाल बत्ती , माल पत्ती
छिछला है, संजीदा है

(और इन्हे देखिये जनाब )

गर्दन झुका के, ना शीशे से झांके
गाडी में तशरीफ़, लैपटॉप पे आँखें
बहुत नाम  है, बहुत काम है
खाना भी खाना है, जाके नहाके


( आज कल की generation ... )

route गलत ले लिया, छूट रही picture
लड़की लड़ाका है , लड़का है लिच्चर
बहुत फ़िक्र है, बड़ा ज़िक्र है
बहुत अच्छी movie है, छोटे बजट पर


(इधर मैं)

मैं जियूं के ना जियूं, एक coke पियूं के ना  पियूं
ज़िम्मेदारियाँ घर बार की, क्यों भई क्यों
career  शुरू  हुआ है लेट,
ला भई छोटू , omlette
करना है अब खाली plate

"order तो अपनी मर्ज़ी करते हो ना ?"
आप कौन?
"एक दिमाग़ी character जो सह चुका..
bullshit  का  enough  वार...
देखो.. शाम हो चुकी..
पकड़ो थोड़ी रफ़्तार !"

omlette, beverage के  सामने
इस insipiration के जाम ने
चला दिया दिल पे car
चल छोटू, pack कर सब ये
lets  just  plunge  into the  war

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Final Act


जंगल वापस आया गोरिल्ला
नाम वही है, काम है ढीला
शहद पे थप्पड़ या फिर लक्कड़
याद मुझे बस शहर का शक्कर

अँधेरे में light न music
दीमकाबाद की घंटो चिक-चिक  
उबड़-खाबड़, सड़क न tower
no more roses , जंगली flower

(लेकिन.. )

लेकिन मेरा लेख तो यही है
शायद आखिरी टेक भी यही है
नदारद है नारद से लोग यहाँ पर
न खट्टी ढकारें, ना मीठा दही है

यही तो है सपना, flora-fauna है  अपना
बस लिखना है लिखना है लिखना है लिखना !
ना धन का प्रलोभन, न choice कोई है
आया गलत हूँ पर रस्ता सही है



"रस्ता सही है, ये कोशिश नयी है
बहुत सारी चीज़ों की ज़रुरत नहीं है"

जैसे?

"
शहर फिर से जाने की....
bathroom  नहाने की....
मुआं ज़माने की..
"
सही फरमाया हुज़ूर , मगर
आप कौन ?

"Third  Act  में आए थे.. भूल गए ?"

ओह.. माफ़ कीजिये।
रहने दें ! तारुफ़ की भी .... 
ज़रुरत नहीं है ! 



Saturday, August 28, 2010

पी गया

भारी भारी भिड गया
हल्के-हल्के
तिकड़म में
दिल आवाजों के दरिया में
फिर से
ripple बना रह गया
कुछ सोचा तराशा लहरों में
लकीरों के लिबास में
तिकोने तेवरों को सीधा गिना
चुप रहा
पी गया ख़ामोशी को ख़ामोशी से

Wednesday, April 7, 2010

दिखा Orion दिखी मुझे तुम

रात्री तिके मोनेर भितोरे
ओनेक गोभीर कोथा छिलो
काछा काछी पेलाम ना जे
आकेशेर ऐकटा कोना दिलो

बड़ी दिसम्बर की रातें हैं सुबह के सपने लम्बे चौड़े
हांफ हांफ कर आती हो तुम नज़र में मेरी दौड़े दौड़े

देखते पारताम सादा शुदु
खाली तोमार मुखेर जॉय
चोक खुले जे घुमाई आमी
तोमार मोतोन आमि निर्भय

धुली ऐसे बात धक्के में ही धड़कन हो गयी
खूब उछली प्यार टकली लम्बी गर्दन हो गयी

चला- चली जे ना करो
एक जागाय ते बोशे थाको
लागे निजेर सीटेर मोध्ये
चोक बूझिये घूमिये पोरेचो

आँखों तले की आधी बातें दी आसमान में क्यूँ उछाल
चुप्पी से भर डाला खुद को ऊपर तारों का जंजाल

तारा तारी कोरी आमि
सोंदये पूरो जेने बुझे
चार दिग तिके मोनेर संबल
तलाय कोथाय गैलो मेजे

मुझे पता है कहाँ रहोगी आने वाले सालों में
तुम्हे है भर रक्खा खुद में और आसमान के पाले में

भीड़-भाड़ बछोड़ भर
कोतो लोकी दैखा जाय
तुमार मोतोन हांसी पाई
तोमार मोतोन बौले बाय

दिखा Orion दिखी मुझे तुम ,सालों से तुम हिली नहीं हो
बूढी हो होकर चमकी हो , रोज़ उम्र में खिली कहीं हो

नाम दिएछे के तोमाके
ऐतो सुन्दोर जिमोन तुमि
चोक घूरिये कोथा बौलो
चोकेर दिगे घूरे भूमि

नाम तुम्हारा पकड़ के बैठे ,सात को बांधे धमकाया
अक्स गिराकर रात समंदर ,उत्तरार्ध भी दिखलाया


एरोकोमो होबे ऐकी शोमाय
बेधे राखबे आमाय तोमाय
एरी जोन्नो बुझी जानी
तोमार मोतोन दैखा जाय

रोज़ तुम्हारी तरफ पहुँचते ,इंच इंच सा सोच सोच कर
कहीं मिलेंगे आसमान में same pinch का सोच-सोच कर !!

Tuesday, March 30, 2010

रेत की बात...डर के साथ

उसे फिर आँखों पर
पट्टी चढ़ाकर
उतार दिया रेत पर

"क्यूँ??
रेत से तो वो डरता भी नहीं था।!!"

तुम्हे पता है इतना...?

"इतना तो पता ही है
के जब भी उसे कुछ डराता है
वो भागकर तुम्हारे पास ही आता है !"

बिकुल सही॥!!

"और तुम डर उतारने की
ताबीज़ बन जाते हो "

थोडा थोडा ठीक है...

"पिछली बार उसे हाथ पैर बाँध..."

हाँ हाँ... तालाब में छोड़ दिया था... !!

"और वो भी तब जब हम दोनों को पता है..."

के उसे तैरना नहीं आता है

"फिर तुमने कहा---
फेफरों में डर की जगह
पानी भरा रहे...
वही अच्छा....!"

ये भी
के इस बूढ़े दिमाग में
थोड़ी जवानी भर जाए तो अच्छा

"पहली बात ये के मैं बूढी नहीं हूँ....
दूसरी....

के अब के क्यूँ रेत पे उतारा है उसे ?"

वो इसीलिए... क्यूंकि...

"एक मिनट... इस बार तो
हाथ पैर भी खुले रखे हैं...
क्या तुक बनता है "

तुक ये के उसे तुक्कों से डर लगता है...:)

"कहीं मैंने ये भी सुना है के...
तुम्हे मुक्कों से डर लगता है..!"

तुक्के से मतलब ऐसे के...
तुक्के से कहीं फिसल ना जाये...!


"तो फिर रेत पर क्यूँ डाला उसे?
फर्श पर तेल डालकर
छोड़ देते दो दिन के लिए...!!"

फिर तो बस उसके फिसलने का डर निकलता

"अहाँ... मगर...आगे बोलो "

सोचो... दिमाग की अलमारी खोलो

"नहीं समझ रहा.... खुलकर बताओ॥"

तो बात ऐसी है के ...
बहुत खुले में रहता है वो
खुला खुला सा रहता है वो

"तो शायद उसके पैर
एक दिन से ज्यादा
किसी फर्श पर नहीं टिके॥!!"

हम्म... और उन्हें ये पता ही नहीं...

"के घर जैसी कोई चीज़ भी होती है..."


हाँ... और हर एक दिन नए
मैट, मार्बल और मिटटी
पर चिपक चिपक कर...........


"वो भ्रष्ट हो गए हैं....
और trust करना भूल चुके हैं...
है ना ?"


हाँ... तभी रेत पर आँख मूंदें
हर तरफ...

"एक जैसा ही महसूस करेंगे
वो पैर जो आज तक एक
pair जूते नहीं सहला पाए"

हम्म... और हाथ पैर खुले इसीलिए...

"ताकि गिरे तो फिर उठे...
आराम से चल पड़े
कुछ देर पट्टी भी उतारे
और गिन ले सारे तारे॥"

exactly.. क्यूंकि इस बार
डर पर नहीं....
डर के जड़ पर वार है....!!

"सवाल अलग है...और
इलाज़ असरदार है...!!"

तो आज का कुल ग्यान

"यही के वो जिसे भेजा है वो
मेरा ही डर है..."

और मैं वही रेत हूँ...

"जहाँ ज़िन्दगी के बाकी दो दिनों तक
आँखों पे पट्टी बांधकर
खड़ी रहने वाली हूँ "

जहाँ गिरने वाली हो...
डरने
वाली हो
और रेत को जिंदा करने वाली हो...!!

Monday, March 8, 2010

एक कम्पन था हुआ दो मूक शब्दों से कहीं....!!

एक कम्पन था हुआ
दो मूक शब्दों से कहीं
थे वधिर माने ये कर्ण
फिर भी कंपा था कुछ वहीं

ना राख थी ना धुल थी
ना धूम्र ही तो था कहीं
फिर भी कहीं दुर्गन्ध है
मन है जला कल्पित नहीं

एक कम्पन था हुआ
दो मूक शब्दों से कहीं....!!

थी धैर्य कि क्यूँ वन्दना
जब प्रेम का कटता तना
चीत्कार करता था के
चित्रों में था उसका मन सना

वो सौम्य सी उठती
तरंगों में तुम्हारा गर्व था
बस प्रेम की वाणी में
जो झोंकता यूं सर्व था

मैं ह्रदय कि चाक में
रमता यूं ही ढोंगी बना
पर ढोंग में भी प्रेम था
जिसको किया तुमने मना

अब आलाप की ये वर्तनी
जानती तुमको नहीं
एक कम्पन था हुआ
दो मूक शब्दों से कहीं......!!!



देखा तुम्हे हर कण में
यूं के एक शंका एक धवल
एक नयन के फूटने की
देर थी जाता संभल

मैं रोक रखूँ दृश्य को
इस झंझावत अदृश्य को
रोकूँ मैं कैसे ज्ञान-कुंठित
मुक्त-भक्त इस शिष्य को

वो तो करता अनुसरण है
जिसमें दिखता उसको मन है
वो देव ना जाने दैत्य ना जाने
तुमको माने अपना धन है

वह प्रणय निवेदन करता है
तुम मुस्कुराती बस रही
एक कम्पन था हुआ
दो मूक शब्दों से कहीं......!!



यह क्या है जो तुम देखती
हो आधी गहरी दंग से
यह कैसे उछला पूर्ण
गर्जन दाब मनो मृदंग से


शैशव में तेरी चेतना का
भार मन ने जड़ लिया
अस्थियों में दस युगों का
प्रण-समर्पण भर लिया

अब वार करना है मुझे
इन शब्दों के प्रपंच पर
और है जलानी दर्प की
लंका मुझे इस मंच पर

यह आत्मा से उपजी है
यह मौन में ही है बही
एक कम्पन था हुआ
दो मूक शब्दों से कहीं ....!!