Saturday, February 21, 2009

बाँट लेंगे चाँद दोनों

"कितनी आसानी से लिखते हो !!"
बाँट लेंगे चाँद दोनों

दौड़ती,
तुम सुबह से शाम हो जाती हो!
एक लम्बी-चौड़ी मुस्कराहट से
एक धीमी मुस्कान हो जाती हो...!
भागती यहाँ से वहां
"ऐसे जैसे किसी खेत में आग लगी हो"
और फ़िर गाँव की तुम
"सोचने दो.....ठकुराइन हो जाती हो |"
तुम्हारे लिए इतना झूठ लिखता हूँ
और तुम्हारा कहना
"तुम बस तारीफों पे बिकते हो |"
बाँट लेंगे चाँद दोनों |

कभी-कभी मज़ाक तुम्हे समझ नहीं आते हैं,
ज्यादातर बाद में तुम्हे तुम्हारे दोस्त ही समझाते हैं |
देर लौटती हो ,दूर तकती हो
"खिड़की के बाहर मुझे सारे नज़र आते हैं |"
मेरी बातों पर हँसती नहीं हो ,
नाराज़ हो जाती हो |
फ़िर गुस्से में आप सुस्त पड़ जाती हो
नींद में दबी-दबी
नींद में घुल जाती हो |
और तो और सपनों में पूछती जाती हो
"हर वक्त इतना खुश क्यूँ दिखते हो ?"
बाँट लेंगे चाँद दोनों |